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रेल यात्रा force sex story part-4 in hindi -Xstoryhindi

मोटी जांघों वाली को उसने पतली टांगों वाली के मुंह के ऊपर बैठा दिया।
पतली टांगों वाली की छातियों के पास घुटने रखवाकर! कविता के पैर रानी के

पैरों तले दबकर वही जम गए। उसके चूतड़ ऊपर उठे हुए थे। चूत को पूरा खोले
हुए। रानी की मांसल जांघें कविता के चेहरे के दोनों तरफ थी। और रानी की
चूत कविता के मुंह के ऊपर!।.....आशीष एक पल को देखता रहा। उसकी कलाकारी
में कहाँ कमी रह गयी और फिर मोटी फ़ांको वाली चूत का जूस निकलने लगा! अपनी
जीभ से। सीधा कर्रेंट कविता के दिमाग तक गया। वो मचल उठी और रानी की छोटी
सी चूत से बदला लेने लगी। उसकी जीभ कविता की चूत में आग लगा रही थी और
कविता की जीभ रानी को चोदने योग्य बना रही थी।

रानी में तूफ़ान सा आ गया और वो भी बदला लेने लगी। कविता की चूचियों को मसल मसल कर।
अब आशीष ने कविता की चूत को अपने लंड से खोदने लगा। खोदना इसीलिए कह रहा
हूँ क्यूंकि वो खोद ही रहा था। ऊपर से नीचे। चूत का मुंह ऊपर जो था।
जितना अधिक मजा कविता को आता गया उतना ही मजा वो रानी को देती गयी। अपनी
जीभ से चोद कर।
अब रानी आशीष के सर को पकड़ कर अपने पास लायी और अपनी जीभ आशीष के मुंह में दे दी।
आशीष कविता को खोद रहा था। कविता रानी को चोद रही थी...(जीभ से ) और रानी
आशीष को चूस रही थी! सबका सब कुछ व्यस्त था। कुछ भी शांत नहीं था।
आशीष ने खोदते-खोदते अपना खोदना उसकी चूत से निकाल और खड़ा होकर रानी के
मुंह में फंसा दिया। अब रानी के दो छेद व्यस्त थे।
ऐसे ही तीन चार बार निकाला-चूसाया फ़िर आशीष ने कविता की गांड के छेद पर
थूका और उसमें अपना लंड फंसने लगा। 1...2...3....4... आशीष धक्के मारता
गया। लंड हर बार थोडा थोडा सरकता गया और आखिर में आशीष के गोलों ने कविता
के चुताड़ों पर दस्तक दी। कुछ देर बर्दास्त करने के बाद अब कविता को भी
दिक्कत नहीं हो रही थी। आशीष ने
रानी को कविता की चूत पर झुका दिया। वो जीभ से उसकी चूत के आस पास चाटने
लगी। अब सबको मजा आ रहा था।
अचानक रानी की चूत ने रस छोड़ दिया। कविता के मुंह पर। ज्यादातर कविता के
मुंह में ही गया। और कविता की चूत भी तर हो गयी।
अब रानी की बारी थी। वो तैयार भी थी दर्द सहन करने को। आशीष ने सबका आसन
बदल दिया। अब कविता की जगह रानी थी और रानी की जगह कविता!

आशीष ने रानी की चूत पर गौर किया। वो सच में ही छोटी थी। उसके लंड के
लिए। पर एक न एक दिन तो इसको बड़ा होना ही है। तो आज ही क्यूँ नहीं!
आशीष ने पहले से ही गीली रानी की चूत पर थोडा थूक लगाया और उसपर अपना लंड
रखकर धीरे धीरे बैठने लगा। जैसे कविता की गांड में बैठा था।
1...2...3...4.. और दर्द में बिलखती रानी ने कविता की चूत को काट खाया।
कविता की चूत से काटने की वजह से खून बहने लगा और रानी की चूत से झिल्ली
फटने से खून बहने लगा। दोनों दर्द से दोहरी होती गयी।!
झटके लगते रहे। फिर मजा आने लगा और जैसे ही रानी का मजा दोबारा पूरा हुआ।
आशीष ने उसकी चूत के रस को वापस ही भेज दिया। अन्दर। अपने लंड से पिचकारी
मारकर। योनी रस की!
तीनों बेड पर अलग अलग बिखर गए। रानी भी औरत बन गयी।

ऐसा करके आशीष को एक बात तो पक्का हो गयी। जब कविता की चूचियों में दूध
नहीं है। तो वो माँ नहीं हो सकती एक साल के बच्चे की!

उधर बुढ़े ने कमरे का एक-एक कोना छान मारा। पर उसे उन पैसों का कोई सुराग
नहीं मिला। जिनके बारे में आशीष बार- बार कह रहा था कि पैसे बहुत हैं। थक
हार कर मन मसोस कर वो बिस्टर पर लेट गया और आशीष के बहार आने का इंतज़ार
करने लगा।

आशीष को याद आया उसको आरक्षण भी कराना है। तीन और टिकटों का।

वह बहार निकाल गया। रेलवे स्टेशन पर।
उसने तीन ही बजे चार नयी सीट अरक्षित करा ली। उसको उनके साथ वाली सीट ही चाहिए थी।

उधर आशीष के जाते ही कविता दूसरे कमरे में गयी।

"बापू! कुछ मिला?"

"कहाँ कविता।! मैंने तो हर जगह देख लिया।"

"कहीं उसके पर्स में न हों "

रानी भी आ गयी!

"तू पागल है क्या? भला पर्स में इतने रुपैये होते है।" बूढ़े ने कहा

"तो फिर चलें। कविता ने कहा। "वो तो बहार गया है "

बूढ़ा- क्या जल्दी है। आरक्षण वाला सफ़र करके भी देख लेंगें शायद वहां कुछ
बात बन जाये। उसने कुछ किया तो नहीं!

कविता- किया नहीं? ये देखो क्या बना दिया। मेरी चूत और गांड का।

कविता ने अपनी सलवार खोल कर दिखा दी। "चल रानी। तू भी दिखा दे!"

रानी ने कुछ नहीं दिखाया। वो चुपचाप सुनती रही।

कविता- ओहो! वहां तो बड़ी खुश होकर चुद रही थी। तुझे भी बडे लंडों का शौक है!

तीनों इक्कठे ही बैठे थे। जब आशीष आरक्षण कराकर अन्दर आया। आशीष को देखते
ही कविता ने अपना पल्लू ठीक किया।

आशीष- ट्रेन 9:00 बजे की है। कुछ देर सो लो फिर खाना खाकर चलते हैं!
और आशीष के इशारा करते ही, वो तीनो वहां से उठ कर जाने लगे। तो आशीष ने
सबसे पीछे जा रही रानी का हाथ पकड़ कर खीच लिया।

रानी- मुझे जाने दो!

आशीष (दरवाजा बंद करते हुए)- "क्यूँ जाने दू मेरी रानी?"

रानी- तुम फिर से मेरी चूत मरोगे!

आशीष- तो तुम्हारा दिल नहीं करता?

रानी- नहीं, चूत में दर्द हो रहा है। बहुत ज्यादा। मुझे जाने दो न।

आशीष ने उसको छोड़ दिया। जाते हुए देखकर वो उसको बोला-- "तुम इन कपड़ों में
बहुत सुन्दर लग रही हो।"

रानी हंसने लगी। और दरवाजा खोलकर चली गयी!

दूसरे कमरे में जाते ही बूढ़े ने रानी को डाँटा- "तुमने उस लौंडे को कुछ
बताया तो नहीं?"

रानी डर गयी पर बोली- "नहीं मैंने तो कुछ नहीं बताया।"

कविता- रानी, राजकुमार को तो तुमने हाथ भी नहीं लगाने दिया था। इससे कैसे
करवा लिया?

रानी कुछ न बोली। वो कविता की बराबर में जाकर लेट गयी।

बूढ़े ने पूछा- "रानी! तुमने उसके पास पैसे-वैसे देखे हैं।

रानी- हाँ! पैसे तो बहुत हैं। वो एक कमरे में गया था और वहां से पैसे
लाया था बहुत सारे!

बूढ़ा- कमरे से? कौन से कमरे से?

रानी- उधर। मार्केट से
बूढ़ा- साला ATM में पैसे हैं इसके। ऐसा करो कविता! तुम इसको अपने जाल में
फांस कर अपने गाँव में ले चलो। वहां इससे ATM भी छीन लेंगे और उसका वो
कोड। भी पूछ लेंगे जिसके भरने के बाद पैसे निकलते हैं।
कविता का उससे फिर से अपनी गांड चुदवाने का दिल कर रहा था। बड़ा मजा आया
था उसको। पैसों में तो उसको बूढ़े ही ज्यादा लेकर जाते थे- "मैं अभी
जाऊं।। फंसने!"

बूढ़ा- ज्यादा जल्दी मत किया करो। अगर उसका मन तुमसे भर गया तो। फिर नहीं चलेगा वो!

कविता- तो फिर ये है न। बड़ी मस्त होकर फढ़वा रही थी उससे!

रानी- नहीं मैं नहीं करुँगी। मेरी तो दुःख रही है अभी तक।

बूढ़ा- तो अभी सो जाओ। रेलगाड़ी में ही करना। अब काम। उसके साथ ही बैठ
जाना। और तीनो लेट गए।
ठीक 9:00 बजे राजधानी एक्सप्रेस स्टेशन पर आई। जब आशीष ने उनको एक डिब्बा
दिखाया तो बूढ़ा भाग कर उसमें चढ़ने की कोशिश करने लगा और उसके पीछे ही वो
दोनों भी भाग ली। उनको लगा जैसे पीछे रह गए तो सीट नहीं मिलेगी। तभी बूढ़ा
खड़ा होकर हंसने लगा- "अरे आरक्षण में भी कोई भाग कर चढ़ता है। यहाँ तो सीट
मिलनी ही मिलनी है, चाहे सबसे बाद में चढो!

आशीष हंसने लगा।
चारों ट्रेन में चढ़े। आशीष अपनी सीट देखकर ऊपर जा बैठा। तो पीछे-पीछे ही
वो भी उसी बर्थ पर चढ़ गए।
आशीष- क्या हो गया ताऊ? अपनी सीट पर जाओ न नीचे!
ताऊ- तो ये अपनी सीट नहीं है क्या?
आशीष उनकी बात समझ गया!- "ताऊ, सबकी अलग अलग सीट हैं। ये चारों सीटें अपनी ही हैं।

ताऊ- अच्छा बेटा, मैं तो आरक्षण में कभी बैठा ही नहीं हूँ। गलती हो गयी!
कहकर ताऊ नीचे उतर गया। रानी भी। और कविता सामने वाली बर्थ पर ऊपर जा
बैठी। बूढ़ा आशीष के ठीक नीचे था! और रानी नीचे के सामने वाले सीट पर।
उनको इस तरह करते हुए देख एक नकचढ़ी लड़की बोली- "कभी बैठे नहीं हो क्या
ट्रेन में?" कहकर वो हंसने लगी। बड़ी घमंडी सी मालूम होती थी और बड़े घर
की भी।
आशीष ने उस पर गौर किया। 22-23 साल की गोरी सी लड़की थी कोई। आशीष को
सिर्फ उसका चेहरा दिखाई दिया। वो लेटी हुयी थी।

उसकी बात सुनकर कविता तुनक कर लड़ाई के मूड में आ गयी- "तुमको क्या है? हम
जहाँ चाहेंगे वहां बैठेंगे। चारो सीटें हमारी हैं। बड़ी आई है!"
इस बात पर उस लड़की को भी गुस्सा आ गया- "हे स्टुपिड विलेजर। जस्ट बी इन
लिमिट। डोन्ट ट्राई टू मैस विद मी!
कविता- अरे क्या बक बक कर रही है तू। तेरी माँ होगी स्टूपिड! कविता को बस
स्टूपिड ही समझ में आया था और उसको पता था ये एक गली होती है।

उस लड़की ने बात बिगड़ते देख आशीष को कहा- "ए मिस्टर! जस्ट शट उप यूर पेट्स
और इ विल...
आशीष- सॉरी म़ा 'म मैं।

"इ 'ऍम नोट a म़ा 'म, यू नो! माय नेम इज मिस शीतल! "

आशीष- सॉरी मिस शीतल! माई नेम इज आशीष!

शीतल- आई हव नो एनी बिज़नस विद योर नेम एंड फेम। जस्ट स्टॉप दा बास्टर्ड(हरामी)!

आशीष को लगा बड़ी तीखी है साली। पर उसने कविता को शांत कर दिया।

इतने में ही एक भाई साहब जो उसके बराबर वाली सीट पर बैठे थे, उन्होंने सर
निकाल कर कहा।- "भैया! खुली हुयी गधी के पीछे नहीं जाते। लात मार देती
है।"

उस शीतल को उसकी कहावत समझ नहीं आई पर आशीष उसकी बात सुनकर जोर-जोर से हंसने लगा।

इससे शीतल की समझ में आ गया की उसने उसी को गधी कहा है और वो उसी से उलझ
पड़ी।- "हाउ डेयर यू टू कॉल। "

पर उस आदमी की हिम्मत गजब की थी। उसने शीतल को बीच में ही रोक कर अपनी
सुनानी शुरू कर दी- "ए! आई डोन्ट केयर! फ़किंग द गर्ल्स इज माई बिज़नेस।
O.k. माई नेम इज संजय राजपूत। अरे गाँव वाले बेचारे क्या इन्सान नहीं
होते। तुझे शर्म नहीं आई उन पर हँसते हुए। यु आर इवेन मोर इलिट्रेट दैन
दे आर। डर्टी बिच!"
शीतल उसकी खरी खरी सुनकर अन्दर तक काँप गयी। आगे कुछ बोलने का साहस उसमें
नहीं था। उसने अपनी आँखों पर हाथ रख लिया और सुबकने लगी! !

लड़कियों की यही अदा तो मार देती है।

"सॉरी! " राजपूत ने कहा!

वो और जोर से रोने लगी।

ये सब नाटक देखकर आशीष इतना तो समझ गया था की लड़की अकेली है!

आशीष उस लड़की को देखने की खातिर राजपूत के पास जा पहुंचा- "हेल्लो
फ्रेंड, मेरा नाम आशीष है। आपका नाम तो सुन ही चूका हूँ।"

राजपूत ने पीछे हटकर जगह दी- "यार ये लड़कियों के नखरे अजीब होते हैं।
अभी खुद बीच में कूदी थी और मैं बोला तो रोने लगी। कोई समझाओ यार इसको।

"मैंने कहा सॉरी शीतल जी!" उसने कहकर शीतल के माथे पर रखा हुआ हाथ पकड़ लिया।

"ए डोंट टच मी!" शीतल ने अपना हाथ झटक दिया।

राजपूत का पारा फिर से गरम हो गया- "अब देख लो! पहले तो इसके कपड़े देखो।
कुछ भी छुप रहा है।? फिर कहती हैं। रेप हो गया!"

राजपूत की इस बात पर आशीष ने मुश्किल से अपनी हंसी रोकी। आशीष ने शीतल को
देखा। उसने घुटनों से भी ऊपर का स्कर्ट डाला हुआ था। जो उसके सीधे लेट कर
घुटने मोड़ने की वजह से और भी नीचे गिरा हुआ था। उसकी मांसल जांघे साफ़
दिखाई दे रही थी। राजपूत के ड्रेस पर कमेन्ट करने के बाद उसने अपनी
टांगों को सीधा कर लिया था। पर उसकी गहरे कटाव वाली चोली में उसकी
मोटी-मोटी चूचियां और उनके बीच की घाटी काफी अन्दर तक दिखाई दे रही थी।
अब भी। बस यूँ समझ लीजिये एक इंच की दूरी पर निप्पल भी ताने खड़े थे।

"छोडो यार!" आशीष ने बात को टालने की कोशिश करते हुए कहा।

"अरे भाई! मैंने इसका अभी तक पकड़ा ही क्या है। हाथ छोड़ कर। सोचा था लड़की
साथ वाली सीट पर होने से रात अच्छी गुजरेगी। पर इसकी माँ की चूत, सारा
मूड़ ही ख़राब हो गया!"

ऐसी गाली सुनकर भी वह कुछ न बोली। क्या पता अपनी गलती का अहसास हो गया हो!

"और सुनाओ दोस्त!" आशीष ने राजपूत से कहा!

"क्या सुनाऊं यार? अपने को तो ऑफिस से टाइम ही नहीं मिलता। मुम्बई जा रहा
हूँ किसी काम से। टाइम तो नहीं था पर दीपक के बुलाने पर आना ही पड़ा।"-
कुछ देर रूककर बोला- "दीपक मेरे दोस्त का नाम है।"

आशीष ने सोचा यूँ तो ये रात यूँ ही निकल जाएगी- "अच्छा भाई राजपूत! गुडनाइट!"

"काहे की गुड नाइट यार! इतना गरम माल साथ है। नींद क्या ख़ाक आएगी!"
राजपूत ने शीतल को सुना कर कहा।

आशीष वापस आ गया। कविता उसी का इंतजार कर रही थी। बैठी हुई!
आशीष ने देखा बूढ़ा लेटा हुआ था आँखे बंद किये! उसने कविता को अपने पास
आने का इशारा किया। वो तो जैसे इंतज़ार ही कर रही थी। उठकर पास आकर बैठ
गयी। रानी भी सोने लगी थी। तब तक!

आशीष ने अपने बैग से चादर निकली और दोनों के पैरों पर डाल ली। कविता ने
देर न करते हुए अपना हाथ पैंट की जिप पर पहुंचा दिया और जिप को नीचे खीच
लिया!
आशीष की पैंट में हाथ डालकर कच्छे के ऊपर से ही उसको सहलाने लगी। आशीष का
ध्यान उसी लड़की पर था। उसके लंड ने अंगडाई ली और तैयार हो गया।

आशीष का कच्छा उसके आनंद में बांधा लगने लगा। वह उठा और बाथरूम जाकर
कच्छा निकला और पैंट की जीप में रखकर वापस आ गया।

चैन पहले से ही खुली थी। कविता ने पैंट से हथियार निकल लिया। और उस खड़े
लंड को ऊपर नीचे करने लगी।

तभी शीतल ने करवट बदल ली और कविता को आशीष के साथ कम्बल में बैठे देख कर
चौंक सी गयी। कविता किसी भी हाल में आशीष की पत्नी तो लगती नहीं थी।

उसने आँखें बंद कर ली। पर आशीष और कविता को कोई परवाह नहीं थी। जब मियां
बीवी राज़ी तो क्या करेगा काजी। हाँ बार बार वो नीचे देखने का नाटक जरूर
कर रही थी। कहीं बापू जाग न जाये।

आशीष ने अपना हाथ उसकी जाँघों के बीच रखा और उसकी सलवार और पैंटी के ऊपर
से ही करीब एक इंच उंगली उसकी चूत में घुसा दी। कविता 'आह ' कर बैठी।

शीतल ने आँखें खोल कर देखा और फिर से बंद कर ली।

कविता ने अपनी सलवार का नाडा खोलकर उसको नीचे सरका दिया और आशीष का हाथ
पकड़ कर अपनी पैंटी की साइड में से अन्दर डाल दिया।

आशीष को शीतल का बार बार आँखें खोल कर देखना और बंद कर लेना। कुछ
सकरात्मक लग रहा था की बात बन सकती है।
उसने कविता की चूत में हाथ डाल कर जोर-जोर से अन्दर बाहर करनी शुरू कर
दी। कविता सिसकने लगी और उसकी सिसकियाँ बढती गयी।

शीतल की बेचैनी बढती गयी। उसके चेहरे पर रखे हाथ नीचे चले गए। शायद उसकी चूत पर!

आशीष ने उसको थोड़ा और तड़पाने की सोची। उसने कविता का सिर पकड़ा और चादर के
अन्दर अपने लंड पर झुका दिया।

अब चादर के ऊपर से बार-बार कविता का सर ऊपर नीचे हो रहा था। शीतल की हालत
नाजुक होती जा रही थी।

शीतल के बारे में सोच-सोच कर आशीष इतना गरम हो गया था की 5 मिनट में ही
उसने कविता का मुंह अपने लंड के रस से भर दिया। ऐसा करते हुए उसने कविता
का सर जोर से नीचे दबाया हुआ था और 'आहें ' भर रहा था।

शीतल आँखें खोल कर ये सीन देख रही थी। पर आशीष ने जैसे ही उसकी और देखा।
उसने मुंह फेर लिया।
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शीतल का खून गरम होता जा रहा था। आशीष ने उसके खून को उबालने की सोची। वो
नीचे उतरा और रानी को उठा दिया। रानी सच में सो चुकी थी।!
रानी- क्या है?
आशीष- ऊपर आ जाओ!
रानी- नहीं प्लीज। दर्द हो रहा है अभी भी।
आशीष- तुम ऊपर आओ तो सही, कुछ नहीं करूँगा।

और वो रानी को भी ऊपर उठा लाया और कविता के दूसरी और बिठा लिया। यहाँ से
शीतल को रानी कविता से भी अधिक दिखाई दे सकती थी।
आशीष ने रानी से चादर ओढ़ कर अपनी सलवार उतारने को कहा। रानी ने मना किया
पर बार-बार कहने पर उसने सलवार निकल दी। अब रानी नीचे से नंगी थी!
शीतल ने पलट कर जब रानी को चादर में बैठे देखा तो उसका रहा सहा शक भी दूर
हो गया। पहले वह यही सोच रही थी की क्या पता कविता उसकी बहू ही हो!
उसने फिर से उनकी तरफ करवट ले ली। आशीष ने उस पर ध्यान न देकर धीरे धीरे
चादर को रानी की टांगों पर से उठाना शुरू कर दिया। रानी की टाँगे शीतल के
सामने आती जा रही थी और वो अपनी सांस भूलती जा रही थी।

जब शीतल ने रानी की चूत तक को भी नंगा आशीष के हाथो के पास देखा तो उसमें
तो जैसे धुआं ही उठ गया। उसने देखा आशीष उसके सामने ही रानी की चूत को
सहला रहा है। तो उसको लगा जैसे वो रानी की नहीं उसकी चूत को सहला रहा है।
अपने हाथों से!

अब शीतल से न रहा गया। उसने आशीष को रिझाने की सोची। उसने मुंह दूसरी तरफ
कर लिया और अपने पैर आशीष के सामने कर दिए। अनजान बनने का नाटक करते हुए
उसने अपने घुटनों को मोड़ लिया। उसका स्किर्ट घुटनों पर आ गई। धीरे-धीरे
उसका स्कर्ट नीचे जाता गया और उसकी लाल मस्त जांघें नंगी होती गयी।

अब तड़पने की बारी आशीष की थी। उसके हाथ रानी की चूत पर तेज़ चलने लगे।
और उसकी आँखें जैसे शीतल के पास जाने लगी। उसकी जांघों में। स्कर्ट पूरा
नीचे हो गया था। फिर भी जांघ बीच में होने की वजह से वो उसकी चूत का
साइज़ नहीं माप पा रहा था। उसने ताव में आकर रानी को ही अपना शिकार बना
लिया। वैसे शिकार कहना गलत होगा क्यूंकि रानी भी गरम हो चुकी थी!

आशीष ने रानी को नीचे लिटाया और उसकी टाँगे उठा कर अपना लंड उसकी चूत में
घुसा दिया। रानी ने आशीष को जोर से पकड़ लिया। तभी अचानक ही गुसलखाने जाने
के लिए एक औरत वहां से गुजरने लगी तो रेल में ये सब होते देखकर वापस ही
भाग गयी, हे राम कहती हुई।

उधर कोई और भी था जो शीतल और आशीष के बीच एक दूसरे को जलाने की इस जंग का
फायदा उठा रहा था! राजपूत!
आशीष भले ही शीतल की जाँघों की वजह से उसकी मछली का आकर न देख पानरहा हो,
पर राजपूत तो उसके सामने लेटा था। बिलकुल उसकी टांगों की सीध में। वो तो
एक बार शीतल की जांघें और उनके बीच में पैंटी के नीचे छिपी बैठी चिकनी
मोटी चूत को देखकर हाथों से ही अपने लंड को दुलार-पुचकार और हिला-हिला कर
चुप करा चुका था। पर लंड तो जैसे अकड़ा बैठा था की चूत में घुसे बगैर
सोऊंगा ही नहीं, खड़ा ही रहूँगा। जब राजपूत ने शीतल को अपनी पैंटी में
अपना हाथ घुसाते देखा तो उसका ये कण्ट्रोल जवाब दे गया। वह आगे सरका और
शीतल की टांग पकड़ ली। उसका लंड उसके हाथ में ही था।
शीतल के पैर पर मर्द का गरम हाथ लगते ही वो उचक कर बैठ गयी। उसने देखा।
राजपूत उसकी जाँघों के बीच गीली हो चुकी पैंटी को देख रहा है। शीतल ने
घबराकर अपना हाथ बहार निकल लिया!
उसकी नजर आशीष पर पड़ी। वो उस वक़्त रानी की टाँगे उठा रहा था उसमें लंड
घुसाने के लिए।
चारों ओर लंड ही लंड। चारों ओर वासना ही वासना। शीतल का धैर्य जवाब दे
गया। उसने तिरछी नजर से एक बार राजपूत की ओर देखा और सीट से उतर कर
गुसलखाने की ओर चली गई।
राजपूत कच्चा खिलाडी नहीं था। वो उन तिरछी नजरों का मतलब जानता था। वह
उतरा और उसके पीछे-पीछे सरक लिया।

उधर रानी में डूबे आशीष को पता ही न चला की कब दो जवान पंछी उड़ गए। मिलन
के लिए। नहीं तो वह रानी को अधूरा ही छोड़ देता!

राजपूत ने जाकर देखा, शीतल गुसल के बहार खड़ी जैसे उसका ही इन्तजार कर
रही थी। राजपूत के उसको टोकने से पहले ही शीतल ने नखरे दिखाने शुरू कर
दिए- "क्या है?"

राजपूत- "क्या है क्या! मूतने आया हूँ।" उसने जानबूझ कर अशलील भाषा का
प्रयोग किया। वह बरमूडे (उसने पैंट नहीं पहन रखी थी ) के ऊपर से अपने तने
हुए लंड पर खुजाते हुए कहा।
शीतल- मेरे पीछे क्यूँ आये हो!

राजपूत- तेरी गांड मारने साली। मैं क्या तेरी पूँछ हूँ जो तेरे पीछे आया
हूँ। तू ही मेरे आगे आ गयी बस!

शीतल- तो कर लो जो करना है। जल्दी। मैं बाद में जाउंगी।
राजपूत- सच में कर लूं क्या?
शीतल- "अरे वो मू....पेशाब करो और चलते बनो।" उसकी आवाज मारे कामुकता के
बहक रही थी पर उसकी अकड़ कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी।

राजपूत में भी स्वाभिमान कूट-कूट कर भरा हुआ था। उसने शीतल के आगे बाहर
ही अपना लंड निकाल लिया और हिलाता हुआ अन्दर घुस गया।
शीतल की आँखें कभी शर्म के मारे नीचे और कभी उत्तेजना के मारे उसके मोटे
लंड को देख रही थी।

राजपूत मूत कर बाहर आ गया और बाहर आकर ही उसने अपना लंड अन्दर किया।-
"जाओ जल्दी अन्दर...तुम्हारा निकलने वाला होगा।
शीतल- पहले तुम यहाँ से फूट लो। मैं अपने आप चली जाउंगी।
राजपूत- नहीं जाता। बोल क्या कर लेगी।
शीतल- तो मैं भी नहीं जाती। तुम क्या कर लोगे?
स्वाभिमान दोनों में कूट-कूट कर भरा हुआ था। कोई भी अपनी जिद छोड़ना नहीं
चाहता था। पर दोनों एक ही चीज चाहते थे। प्यार! पर उनकी तो तब तक बहस ही
चल रही थी जब आशीष के लंड ने आखरी सांस ली। रानी की चूत में। कुछ देर वो
यूँ ही रानी पर पड़ा रहा!
उधर युद्ध की कगार पर खड़े शीतल और राजपूत की बहस जारी थी। राजपूत ने अपना
लंड निकाल कर बाहर कर लिया।- "लो मैं तो यहाँ ऐसे खड़ा रहूँगा।

शीतल- शर्म नहीं आती!
राजपूत- जब तेरे को ही नहीं आती तो मेरे को क्या आएगी। मुझे तो रोज ही
देखना पड़ता है।

शीतल जब तुझे नहीं आती तो मुझे भी नहीं आती। निकाल के रख अपना। मुझे क्या
है। शीतल के दिल में था की उसको पकड़ कर अपनी चूत में घुसा ले। पर क्या
करें अकड़ ही इतनी थी- "जा चला जा यहाँ से!
राजपूत- नहीं जाता, बोल क्या कर लेगी।

शीतल से रहा न गया- "तो मैं भी निकाल दूंगी। देख ले "

और अंधे को क्या चाहिए। दो आँखें! राजपूत को लगा कहीं नरम होने से काम
बिगड़ न जाये- "तेरी इतनी हिम्मत तू मेरे आगे अपने कपडे निकालेगी!

शीतल- मेरे कपडे, मेरा शरीर, मैं तो निकालूंगी! "

राजपूत- तू निकाल के तो देख एक बार!

शीतल ने तुरंत अपनी स्किर्ट नीचे खींच कर पैरों में डाल दी। क्या खूबसूरत
माल थी। शीतल! चूत के नीचे से उसकी जांघें एक दूसरी को छु रही थी। बला की
खूबसूरत उसकी जाँघों के बीच उसकी योनी का आकर पैंटी के ऊपर से ही दिखाई
पड़ रही था। पैंटी नीचे से गीली हो रखी थी और उसकी दोनों फांक अलग-अलग
दिखाई दे रही थी!

राजपूत की आवाज कांप गयी- "पप...पैंटी न...निकाल के दिखा तू!"

और शीतल ने मारे गुस्से के पैंटी भी निकाल दी। भगवान ऐसे झगड़ने वाली
लड़की से रेल में सबको मिलवाए।

राजपूत ने देखा। उसकी चूत एकदम चिकनी और रस से सनी हुयी थी। उसकी चूत के
दोनों पत्ते उसकी फांको में से थोडा-थोडा झांक रहे थे। राजपूत का हाथ
अपने आप ही उसकी चूत की तरफ जाने लगा। वो झगडा ख़त्म करना चाहता था। वो
हार मानने को भी तैयार था। पर शीतल ने उसकी चूत की तरफ बढ़ते हाथ को पकड़
लिया- "क्या है!"

राजपूत की आवाज मेमने जैसी हो गयी- "मैं तो बस छूकर देख रहा था। "

बहुत हो चुका था। शीतल ने अपने हाथ में पकडे उसके हाथ को एकदम जैसे अपनी
चूत में फंसा लिया। राजपूत घुटनों के बल बैठ गया और उसकी चूत के होंठों
पर अपने होंठ लगा कर उसकी चूत के फैले पत्तो को बाहर खींचने लगा। शीतल की
चूत कितनी देर से अपने आपको रोके बैठी थी। अब उससे न रहा गया और वो बरस
पड़ी।- "आआआ। माआअ। रीईईई। मर गयीइईईई रे!"
राजपूत ने उसके चेहरे की और देखा। वो तो खेल शुरू करने से पहले ही आउट हो
गयी। टाइम आउट। उसने अपना स्कर्ट उठाया पहनने के लिए। राजपूत ने स्कर्ट
उससे पहले ही उठा लिया।

शीतल- क्या है।?

राजपूत का पारा फिर गरम होने लगा- "क्या है क्या? गेम पूरा करना है "

पर जैसे शीतल के दिमाग की गर्मी उसकी चूत के ठंडे होते ही निकल गई-
"प्लीज मुझे जाने दो। मेरी स्कर्ट और पैंटी दे दो "

राजपूत- वाह भाई वाह। तू तो बहुत सयानी है। अपना काम निकाल कर जा रही है।
मैं तुझे ऐसे नहीं छोडूंगा "

शीतल समझौते के मूड में थी- "तो कैसे छोड़ोगे?"
राजपूत- छोडूंगा नहीं चोदुंगा!

शीतल- प्लीज एक बार स्कर्ट दे दो। ठोड़ी देर में कर लेना!

राजपूत- नहीं नहीं। चल ठीक है। तू अपना टॉप उतर कर अपनी चूचियां दिखा दे।
फिर जाने दूंगा।!

शीतल- प्रामिस!

राजपूत- अरे ये संजय राजपूत की जुबान है।! राजपूत कुछ भी कर सकता है,
अपनी जुबान से नहीं फिर सकता। समझी!

शीतल ने अपना टॉप और समीज ऊपर उठा दिए- "लो देख लो!"

राजपूत उसके चिकने पत्ते और उसकी कटोरी जैसी सफ़ेद चूचियीं को देखता रह
गया। शीतल ने अपना टॉप नीचे कर दिया।

राजपूत को ऐसा लगा जैसे ब्लू फिल्म देखते हुए जब निकलने वाला हो तो लाइट
चली जाये- "ये क्या है।! बात तो निकालने की हुई थी!"

शीतल- प्लीस जाने दो न, मुझे नींद आ रही है!

राजपूत- अच्छा साली! मेरी नींद उड़ा कर तू सोने जाएगी!

शीतल ने टॉप और समीज पूरा उतार दिया और मादरजात नंगी हो गयी। जैसे आई थी
इस दुनिया में!

राजपूत तो इस माल को देखते ही बावला सा हो गया। शीतल को उलट पलट कर देखा।
कोई कमी नहीं थी, गांड चुचियों से बढ़कर और चूचियां गांड से बढ़कर!

"अब दे दो मेरा स्कर्ट!" शीतल ने राजपूत से कहा।

राजपूत ने उल्टा उससे टॉप भी छीन लिया।

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