कलयुग की द्रौपदी part - 8 xstorhindi

इस विचार से प्रेरित होकर बिंदिया ने आख़िरकार अपने हाथ बिस्तर पर निढाल कर दिए और सर झुकाते हुए लाचार स्वर में बोली – ठीक है, आप लोग जैसा बोलेंगे, हम वैसा करेंगे, पर सुबह होते ही हुमको घर छ्चोड़ दीजिएगा. और कृपया कर के हमको ज़्यादा दर्द मत दीजिएगा!!

उसकी ये बात सुनते तीनों के चेहरे पर एक विजयी मुस्कान खिल गयी. रंगा ने एक राहत की साँस ली की अब उन्हे इस कली को प्यार से मसल्ने को मिलेगा. अब उसने भी अपने कपड़े उतार दिए.

पर राका को इस खेल में उतना मज़ा नही आया क्यूंकी उसे तो शिकार को तडपा कर मारने में मज़ा आता था. फिर भी यारों के फीलिंग्स और फेटिश का ख़याल कर वो मन मसोस कर रह गया. पर अंदर-ही-अंदर उसने ठान ली कि अपनी बारी आते ही वो इस लड़की को नानी याद दिला देगा.

शुरूवात रंगा ने की. सिसकती बिंदिया के करीब आकर वो उसके कुर्ते को उठाने लगा. बिंदिया ने तो सारे हथियार डाल दिए थे. लाचरगि में उसने अपने हाथ उपर कर दिए. रंगा ने उसके बाजुओं से कुर्ता निकाल फेका. कुर्ता निकलते ही बिंदिया ने लाज से अपने नंगी चूचियो को अपने हाथों से ढक लिया और सुबुक्ते हुए फिर रंगा की ओर फरियादी नज़रों से देखते हुए बोली – प्लीज़, ज़्यादा दर्द तो नही होगा ना??????
रंगा पूचकारते हुए उसे अपने पालती मरी हुई जांघों पर बैठते हुए उसके कानों में बोला – मर्द का वचन है बूछिया, दरद चाहे जितना हो पर मज़ा पूरा मिलेगा. अच्छा हुआ जो तुम खुद तैयार हो गयी, अब देखना तुम कभी घर जाने का बात नही करोगी!! आज रात हम तोहार फूल जैसा बदन का हर पंखुड़ी से खेलेंगे और तुमको सदाबहार फूल बना देंगे.

उसकी बातें सुन ना जाने क्यूँ बिंदिया के चूत के दानों में चिंचीनाहट दौड़ गयी.
वो रंगा की गोद में पीठ करके बैठी थी और रंगा की दोनों हाथेलि उसके दोनो चूचियों से खेल रही थी. घुंडीयों के मीसने से और कान के लाओं और गर्देन पर सरसरते रंगा के गरम लबों ने बिंदिया के पूरे जिस्म में खलबली मचा दी. उसके संतरे के किशमिश टाइट हो गये……पूरे 1” लूंबे. मस्ती से उसका गोरा चेहरा लाल तमतमा रहा था.

बिंदिया की आँखें बंद थी इसलिए उसे एहसास ना हुआ कि कब जग्गा ने उसकी अधखुली सलवार को आहिस्ते से उसके पैरों से निकाल दिया. जब उसके नंगी जांघों पर ठंडी हवा की सिरहन हुई तो उसकी आँखें खुल गयी. सामने जग्गा भूखे लार टपकते भेड़िए जैसा उसके मांसल जांघों को और लाल लेसस वाली चड्डी में बूँद पाव-रोटी जैसी चूत को ताक रहा था.
उसकी रक्त-पीपासु आँखों को देख बिंदिया सहम गयी. रंगा की तरफ ना जाने क्यूँ उसका थोड़ा सॉफ्टनेस होने लगा था. इसलिए जग्गा की नज़रों से बचने के लिए उसने मूह फेर्कर रंगा के छाती में छुपा लिया.
इधर जग्गा बेड पर पट लेटकर अपना सर बिंदिया के चूत के करीब लाया और सूंघने लगा. कौले अनछुए चूत की महक उसे बौरा गयी और उसने अनायास ही बिंदिया के जाँघ फैला दिए और चूत पर चड्डी के उपर से ही अपने होठ रख दिए और चूमने लगा.
बिंदिया इसके लिए तैयार ना थी. उसे 440वोल्ट का झटका सा लगा और उसके मूह से एक आआहह……… निकल गयी.
जवानी और ज़िंदगी ने उसके लिए इस रात मे क्या सॅंजो के रखा था ये तो वो कल्पना नही कर सकी थी पर अब तक जॉब ही हुआ ना जाने क्यूँ उसे कैसी भी भयानक कल्पना से परे एक मीठा एहसास दे रही थी. ……………. पर अभी राका तो बाकी था.

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