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बिना झान्टो वाली बुर पार्ट--4

मैं बगल के अपने कमरे में आ गयी पिछे-पिछे जीजाजी आ गये और आकर पलंग पर लेट गये और बोले, "तुम तैयार हो जाओ.... मुझे क्या बस कमीज़ पॅंट पहनना है" मैं बाथरूम में मूह धो आई और उपर के कपरे उतार दिए अब मैं पॅंट और ब्रा में थी, ब्रा का हुक फँस गया जो खुल नही रहा था मैं जीजा जी के पास आई और बोली, "ज़रा हुक खोल दीजिए ना" मैं पलंग पर बैठ गयी.

 उन्होने हुक खोल कर दोनो कबूतरों को पकर लिया फिर मेरे होंठ को अपने होंठ में ले लिया. उनके हाथ मेरी पॅंटी के अंदर पहुँच गये. अपने को छुड़ाने की नाकाम कोशिश की लेकिन मन में कही मिलने की उत्सुकता भी थी,मैं बोली "जीजाजी आप ये क्या करने लगे, वहाँ चल कर यही सब तो होना है.... प्लीज़ जीजाजी उगली निकालिए....ओह्ह्ह... क्यो मन खराब करते हैं... ओह्ह्ह.. बस भी कीजिए..." 

जीजाजी कहाँ मानने वाले थे उन्होने पॅंटी उतार दी और मेरी बिना झांतो वाली बुर को चूमने चाटने लगे और बोले, " मैं इस बिना बाल वाली बुर का दीवाना हो गया हूँ मन होता है कि ऐसे दिन रत प्यार करूँ.... हाँ! अब जब तक अपना राज नही खोलो गी मैं मैं कुत्ते की तरह अपना लंड तुम्हारी बुर में फँसा दूँगा जैसे तुमने कल देखा था" 

मैने जीजाजी को घूरा "जीजाजी आप बहुत गंदे है... तभी जब मैं अंदर आई तो आप का लॉरा खड़ा था.... एक बात जीजा जी मैं भी बताउ जब आप चोद रहे थे तो मेरे मन में भी यह बात आई थी कि काश मेरी बुर कुतिया की तरह आप के लॅंड को पकड़ पाती तो कितना मज़ा आता... आप छूटने के लिए बेचैन होते, आप सोचते ताव-ताव में साली को चोद तो दिया पर अब फँस कर बदनामी भी उठानी परेगी..

" जीजा जी ने अब तक गरमा दिया था मैने उन्हे अपने उपर खींच लिया बोली "जीजा जी सुबह से बेचैन हूँ अब आ भी जाओ एक राउंड हो जाए" "हाँ रानी! मैं भी सोकर उठने के बाद तुम्हरी बदमाशी को मानता आ रहा हूँ पर अब यह भी अपनी मुनिया को देखकर मिलने के लिए बेचैन हो रहा है" जीजा जी मेरी भाषा का प्रयोग करते हुए बोले और अपना समूचा लॉरा मेरी बुर में पेल दिया. 

थोरा दर्द तो हुआ पर प्यासी बुर को बरी तसल्ली हुई जब उनका लॉरा मेरी बुर के अंदर ग्रभाशय के मुख तक पहुँच कर उसे चूमने लगा. जीजा जी धक्के पर धक्के लगाए जा रहे थे और मैं भी अपनी चूतर नीचे से उठा उठा कर अपने बुर मे उनके लंड को ले रही थी पर अचानक जीजा जी रुक गये. 

मैने पुंच्छा "क्या हुआ? रुक क्यो गये" जीजा जी बोले, "बुर के बाल गढ़ रहे है" कह कर मुस्कराते हुए बोले "अब तो राज जानकार ही चुदाई होगी" मैं जीजा जी की पीठ पर घूँसा बरसाते हुए बोली " जीजा जी खरे लंड पर धोका देना इसे ही कहते हैं... अच्छा तो अब उपर से हटिए, पहले राज ही जान लो जीजाजी मेरे बगल में आ गये फिर मैं धीरे-धीरे राज खोलने लगी. 

"मॅमी ने अपनी एक सहेली को मेरी बुर को दिखा कर इस राज को खोला था. उन्होने उसे बताया था कि जब मैं पैदा हुई तो एक नई और जवान नाइन नहलाने के लिए आई. मेरी पुरानी नाइन बीमार थी और उसने ही उसे एक महीने के लिए लगा दिया था. 

मम्मी को नहलाने के बाद उसने मुझे उठाया और मेरी बुआ से कहा कि बीबीजी ज़रा चार-पाँच काले बेगन (ब्रिंजल) काटकर ले आइए, इसे बेगन के पानी से भी नहलाना है, मेरी मॅमी ने पुंच्छा कि अरी! नहलाने मे बेगन के पानी का क्या काम? इस पर उसने हँसते हुए बताया कि बेगन के पानी से लरकियों को नहलाने पर उनके बाल नही निकलते, लेकिन नहलाते समय यह ध्यान रखना पड़ता है कि वह पानी सर पर ना लगे.

 मॅमी ने कहा कि मैं इस बात को कैसे मानू? तो उसने अपनी बर मॅमी को दिखाते हुए कहा की भाभी जी मेरी देखिए एस पर एक भी बाल नही दिखेंगे. मॅमी और बुआ मान गयी और बोली की ठीक है नहला दो पर ध्यान से नहलाना. बुआ हलके कुनकुने पानी में बेगन काट कर डाल दी और नाइन ने मुझे नहलाने के बाद बरी सफाई से बेगन के पानी से मेरे निचले भाग को धो दिया, इसी तरह उसने दो तीन दिन और बेगन के पानी से मेरे निचले भाग को धोया. 

बात आई-गयी ख़तम हो गयी, मॅमी भी इस बात को भूल चुकी थी, मैं अठारह की हुई मेरी सहेलियों को काली-भूरी झांते निकल आई पर मेरी बुर पर बाल ही नही निकले. एक दिन कपड़ा बदलते समय मॅमी की नज़र मेरी बुर पर गयी और उन्होने मुझे टोकते हुए कहा बेटी! अभी से बाल साफ करना ठीक नही है, बाल काले हो जाएँगे.

 मैने कहा मॅमी मेरे बाल ही कहाँ है कि मैं उसे साफ करूँगी" अचानक मॅमी को उस नाइन का ख्याल आया और उन्होने मुझे पास बुलाया और मेरी बुर को हाथ लगा कर देखा और बरी खुस हुई. सचमुच मेरे बदन पर बाल निकले ही नही. अब जब भी मम्मी की कोई खास सहेली मेरे घर आती है तो मुझे अपनी बुर उसे दिखानी परती है, लेकिन मॅमी सब को इस रहस्य को बताती नही.

 एक दिन मॅमी की एक सहेली बोली, कि तू तो बरी किस्मेत वाली है, तेरा आदमी तुझे दिन-रात प्यार करेगा, बस यही है इस बिना बाल वाली बुर की कहानी"इस बीच जीजाजी बुर को सहला-सहला कर उसे पनिया चुके थेआब वे मेरी टाँगो के बीच आ गये और अपना शिश्न मेरी यौवन गुफा में दाखिल कर दिया. मैं चुदाई का मज़ा लेने लगी. नीचे से चूतर उचका उचका कर चुदाई में भरपूर सहयोग करने लगी. "हाई मेरे चोदु सनम तुम्हारा लंड बरा जानदार है तीन चार बार चुद चुकी हू पर लगता है पहली बार चुद रही हूँ...

 मारो राजा धक्का... और जूऊर से पूरा पेल दो अपना लॉरा ..... आज इसे कुतिया की तरह बुर से निकलने नही दूँगी.. लोगा आएगे देखेंगे जीजा का लॉरा साली की बुर में फसा है.... जीजा ... अच्च्छा बताओ... अगर ऐसा होता तो क्या आप मुझे चोद पाते...." मैं थोरा बहकने लगी. जीजू मस्त हो रहे थे बोले,

 "चुदाई करते समय आगे की बात कौन सोचता है फस जाता तो फस जाता जो होना है होगा पर इस समय चुदाई मे ध्यान लगाओ मेरी रानी.... आज चुदाई ना होने से मन बरा बेचैन था उससे ज़्यादा तुम्हारा राज जानना चाहता था .... अब चुदाई का मज़ा लेने दो ले लो अपनी बुर में लौरे को और लो आज की चुदाई में मज़ा आ गया ... हाँ रानी अपनी चूत को इस लौरे के लिए हमेशा खोले रखना...लो मजाआआआआआआआ लो रनीईईईई" जीजा जी उपर से बोल रहे थे और मैं नीचे से उनका पूरा लॉरा लेने के लिए ज़ोर लगाते हुए बर्बरा रही थी, " ऊऊओ मेरे चुदक्कर राजा चोद दो.... 

अपनी बिना झांतो वाली इस बुर्र्र्र्र्र्ररर कूऊऊऊ और चोदूऊऊऊ फर्रर्र्र्ररर दूऊऊओ एस साली बुर को.... बरी चुदासी हो रही थी.... सुबह से...... जीजाजी साथ साथ गिरना .... हाँ अब... मैं आने वाली हूँ ..... कस.... कस.... कर दो चार धक्के और मारो चूसा दो अपनी मुनिया को मदनरस.... मिलने दो सुधारस को मदनरस से.... ओह जीजू आप पक्के चुदक्कर हूऊओ.... 

ना जाने कितनी बुर को अपने मदनरस से सिंचा होगा....आज तो रात भर चुदाई का प्रोग्राम है... तीन बुर से लोहा लेना है.. लेकिन मेरी बुर का तो यही बजा बजा दिया..... मारो राजा और ज़ोर से.... थक गये हो तो बताओ मैं उपर आ कर चोद दू..... इस भोसरी को.... ओह अब मैं नहियीईईईईईईईईईईईई रुक्कककककककक सकाआति ओह अहह लूऊऊ माइ गइईई ओह राजा तुम भी एयाया जाऊऊऊ" 

मैं नीचे से झरने के लिए बेकरार हो रही थी और जीजा जी भी उपर से दना डन धक्के पै धक्के मार रहे थे पूरे कमरे में चुदाई धुन बज रही थी मॅमी भी नीचे नही थी इस लिए और निसचिंत थी खूब गंदे गंदे शब्दों का आदान-प्रदान हो रहा था आज का मज़ा ही और था.. बस चुदाई ही चुदाई.. 

केवल लौरे और बुर की घिसाई ही घिसाई... जीजाजी अब झरने के करीब आ रहे थे और उपर से कस कस कर थक्के लगा कर बोलने लगे, "ओह्ह्ह्ह मेरी बिना झांतो वाली बुर की शहज़ादी तेरी बुर तो आफताभ है....चोद चोद का इसे इतना मज़ा दूँगा कि मुझसे चुदे बिना रह ही नही पाओगी....चुदाई के लिए सब समय बेकरार रहो गी....ओह रानी!!!!!! 

एक बार फिर साथ-साथ झरेंगे....ओह अब तुम भी आआअजाओ......" कहते हुए जीजू मेरी बुर की गहराई में झार गये और मैं भी साथ-साथ खलाश हो गयी.... जीजू मेरी छाती से चिपक गये कुछ पल तो ऐसा लगा की मुनिया ने उनके लौरे को फसा लिया है. 

थोरी देर इसी तरह चिपके रहे फिर मैं जीजा जी को उतारते हुए बोली, " अब उठिए! कामिनी के यहाँ नही चलना है क्या?" जीजू बोले, "जब अपने पास साफ-सुथरा लॅंडिंग प्लॅटफॉर्म है तो जंगल में एरोप्लेन उतारने की क्या ज़रूरत है" उनकी बात सुनकर दिल बाग-बाग हो उठा और मैने उन्हे चूमते हुए कहा, 

"जीजाजी! कामिनी के यहाँ तो चलना ही है, ज़बान दे दी है" फिर हसते हुए बोली, " कहीं तीन की वजह से डर तो नही रहे है" मैने उनकी मर्दानगी को ललकारा. "अब मेरी प्यारी साली कह रही है तो चलना ही परेगा, कुच्छ नया अनुभव होगा" जीजा जी उठे और हम दोनो नेबाथरूम मे जा साफ-सफाई की और कपड़ा पहनने लगे. तभी नीचे मैन गेट खुलने की आवाज़ आई. 

मैने जीजाजी से कहा "अब आप दीदी के कमरे मे चलिए मॅमी आ गयी हैं" जीजाजी अपने कमरे में चले गये. 

मैं तैयार हो कर अपने कमरे से निकली तो देखा चमेली चाय लेकर उपर आ रही है. हम दोनो साथ-साथ जीजा जी के कमरे में घुसे देखा जीजाजी तैयार होकर बैठे हैं. चमेली चहाकी, "वह! जीजाजी तो तैयार बैठे हैं, कामिनी दीदी से मिलने की इतनी जल्दी है?" मैने उससे कहा, "चमेली तुझे बोलने की कुच्छ ज़्यादा ही आदत पड़ती जा रही है, चल चाय निकाल" चमेली ने दो कप में चाय निकली और एक मुझे दी और एक जीजाजी को पकड़ा कर मुस्करा दी, बोली "जीजाजी लगता है दीदी ने ज़्यादा थका दिया है सिगरेट निकालू?" " हाँ रे 
पीला, लेकिन मेरे पकेट मे तो नही है" "अरे दीदी ने मुझसे मगवाया था यह लीजिए" और उसने अपने चोली से निकाल कर जीजाजी को सिगरेट पकड़ा दी" जीजाजी चाय पीते हुए बोले " अरे एक सुलगा कर दे ना" चमेली ने सिगरेट सुलगाया और एक कश लगा कर धुआँ जीजाजी के उपर उड़ाते हुए बोली "दीदी का मसालालगा दूँ या सादा ही पिएगें" हमलोग उसकी दो-अर्थी बाते सुनकर हंस पड़े" मैने उसे डाँटते हुए कहा "चमेली तू हरदम हँसती और मज़ाक करने के मूड में क्यो रहती है"

 "क्या करूँ दीदी दुनिया में इतने गम है कि उससे झुटकारा नही मिल सकता खुशी के इन्ही लम्हो को याद कर इंसान अपना सारा जीवन बिता देता है" "अरे वह मेरी छेमिया फिलॉसफर भी है" जीजा जी बोले. चमेली के चेहरे पर ना जाने कहा से गमो के बदल मदराए पर जल्दी ही उरनच्छू हो गये. "जीजाजी ये छमिया कौन है" फिर हम सब हंस परे. मैने चमेली से कहा "चलो नीचे गरेज का ताला खोलो, कार कयी दीनो से निकली नही है साफ कर देना, और मॅमी जो दे उसे रख देना, मेरा एक बॅग मेरे कमरे से ले लेना पर उसे मॅमी ना देख पाए." जीजाजी बोले "अरे उसमे ऐसी क्या चीज़ है" मैं बोली जीजाजी आपके लिए भाभी के कमरे से चुराई है, वही चलकर दिखाउन्गि" 

हमलोग मॅमी से कह कर घर से कार पर निकले. एक जगह गाड़ी रोक कर जीजाजी अकेले ही कुच्छ खरीद कर एक झोले में ले आए और मुझसे कहा "सुधा अब तुम स्टारर्रिंग सम्हालो" मैने उन्हे छेड़ते हुए कहा "जीजाजी को आज तीन गाड़ी चलानी है इसी लिए इस गाड़ी को नही चलाना चाहते" और मैं ड्राइवर सीट पर बैठ गयी, मेरे बगल में जीजू और चमेली को जीजाजी ने आगे बुला कर अपने बगल मे बैठा लिया. हमलोग कामिनी के घर के लिए चल परे जो थोरी ही दूर था........ 

रास्ते में जीजाजी कभी मेरी चूची दबाते तो कभी चमेली की मैं ड्राइव कर रही थी इस लिए उन्हे रोक भी नही पा रही थी मैने कहा, "जीजाजी क्यो बेताब हो रहे हैं वहाँ चल कर यही सब तो करना है, मुझे गाड़ी चलाने दीजिए नही तो कुच्छ हो जाएगा" जीजाजी अब चमेली की तरफ़ हो गये और उसकी चून्चि से खेलने लगे और चमेली जीजाजी की जिप खोलकर लंड सहलाने लगी फिर झुककर लंड मूह में ले लिया. यह देख कर मैं चमेली को डाँटते हुए बोली, "आरे बुर्चोदि छिनार, यह सब क्या कर रही है कामिनी का घर आने वाला है" चमेली जो अब तक जीजाजी के नशे में खो गई थी जागी, और ये देख कर कि कामिनी का घर आने वाला है जीजाजी के खरे लंड को किशी तरह थेलकार पॅंट के अंदर किया और जिप लगा दिया. जीजाजी ने भी उसकी बुर पर से अपना हाथ हटा लिया. 

जब हमलोग कामिनी के घर पहुँचे तो चमेली ने उतर कर मैन गेट खोला मैने पोर्टिको मे गाड़ी पार्क की. तब तक कामिनी और उसकी मा दरवाजा खोल कर बाहर आ गयी. 

जीजाजी कामिनी की मा के पैर छूने के लिए झुके, कामिनी की मा बोली "नही बेटा! हमलॉग दामाद से पैर नही छुवाते, आओ अंदर आओ" हमलोग अंदर ड्रॉइग्रूम में आ गये. कामिनी की मा रेखा और घर वालो का हालचाल लेने के बाद आज के लिए अपनी मजबूरी बताते हुए कहा, "बबुआ जी आज यही रुक जाना कामिनी काफ़ी समझदार है वह आपका ध्यान रखेगी, कल दोपहर दो बजे तक मैं आजवँगी, कल तो सनडे है, ऑफीस तो जाना नही है, मैं आउन्गी तभी आप जाइएएगा. अच्च्छा तो नही लग रहा है पर मजबूरी है जाना तो परेगा ही." जीजाजी बोले मॅमी जी किसके साथ जाएँगी कहिए तो मैं आपको मामा जी के यहाँ छोड़ दूं" कामिनी की मा बोली "नही बेटा, चंदर (ममाजी) लेने आते ही होंगे. 

तभी मामा जी के कार का हॉर्न बाहर बजा. कामिनी बोली लो मामा जी आ भी गये, वह बाहर गयी और आ कर अपनी मा से बोली, "मामा जी बहुत जल्दी में है अंदर नही आ रहे है कहते है मॅमी को लेकर जल्दी आ जाओ. उसकी मा बोली, "बेटा तुम लोग बैठो मैं चलती हूँ कल मिलूँगी" 

कामिनी मॅमी को मामा की गाड़ी पर बिठा कर और मैन गेट पर ताला और घर का मुख्य दरवाजा बंद कर जब अंदर आई तो मुझसे लिपट गयी और बोली, "हुर्रे! आज की रात सुधा के नाम" फिर जीजाजी का हाथ पकड़ कर बोली, "आपका दरबार उपर हॉल में लगेगा और आपका आरामगाह भी उपर ही है. जहांपनाह! उपर हॉल में पूरी वयवस्था है डिनर भी वही करेंगे, मॅमी कल दोपहर लंच के बाद आएँगी इस लिए जल्दी उठने का जांझट नही है, हॉल में टीवी, सीडी प्लेयर लगा है और तांस (प्लेयिंग-कार्ड) खेलने के लिए कालीन पर गद्दा बिच्छा है" 

जीजाजी बोले, "तांस" "मॅमी ने तो तांस के लिए ही बिच्छवाया था लेकिन आप जो भी खेलना चाहें खेलिएगा, वैसे आप का बेड भी बहुत बरा है" कामिनी मुझे आँख मारती हुई बोली" 

"चमेली से ना रहा गया बोली, " जीजाजी को तो बस एक खेल ही पसंद है..खाट कबड्डी.. आते आते...." चमेली आगे कुच्छ कहती मैने उसे रोका, "चुप शैतान की बच्ची ! बस आगे और नही" जीजाजी बोले, "अब उपर चला जाय" 

कामिनी सब को रोकती हुई बोली, "नही अभी नही, नस्ता करने के बाद, लेकिन दरबार में चलने का एक क़ायदा है शहज़ादे" "वह क्या? हुस्न-की-मल्लिका" जीजाजी उसी के सुर मे बोले. 

कामिनी बोली, "दरबार में ज़्यादा से ज़्यादा एक कपड़ा पहना जा सकता है" "और कम से कम, चलो हम सब कम से कम कपरे ही पहन लेते है" जीजाजी चुहल करते हुए बोले "चलो पहले कपरे ही बदल लेते है" 

सब्लोग ड्रेसिंग रूम में आ गये. कामिनी बोली, " सब लोग अपने अपने ड्रेस उतार कर ठीक से हॅंगर करेंगे फिर मैं शाही कपड़े पहनाउगि" चमेली बोली, "मुझे भी उतारने है क्या? 

"क्यों? क्या तू दरबार के काएदे से अलग है क्या?" और हम्दोनो ने सबसे पहले उसी के कपरे उतार कर नंगी कर दिया फिर उसने हम्दोनो के कपरे एक-एक कर उतारे और हॅंगर कर दिए और जीजाजी की तरफ देख कर कहा अब हमलोग कम-से-कम कपड़े मे है. 

जीजाजी की नज़र कामिनी पर थी. कामिनी मुस्काराकार जीजाजी के पास आई और बोली, " शहज़ादे अब आप भी मदरजात कपरे मे आ जाइए" और उसने उनके कपरे उतारने शुरू किए. 

चमेली मेरे पास ही खड़ी थी मुजसे धीरे से बोली "सुधा दीदी, कामिनी दीदी कैसी है आते ही मूह से गाली निकालने लगी मदर्चोद कपरे.." मैने उसे समझाया, "अरे पगली! मदर्चोद नही मदरजात कपड़ा कहा, जिसका मतलब है जब मा के पेट से निकले थे उस समय जो कपड़े पहने थे उस कपड़े में आ जाइए" "पेट का बच्चा और कपड़ा" "आरे बात वही है बच्चा नंगा पैदा होता है और उसीतरह आप भी नंगे हो जाओ, जैसे कि तू खड़ी है मदरजात नंगी" "ओह दीदी, पढ़े-लिखों की बाते.." चमेली की बात पर सब लोग खूब हासे. चमेली अपनी बात पर सकुचा गयी. 

कामिनी जीजाजी को नगा कर कपड़े हॅंगर करने के लिए चमेली को दे दिए और खुद घुटनो के बल बैठ कर जीजाजी के लंड को चूम लिया. मैने पुचछा, "अरी यह क्या कर रही है क्या यहीं...." 

अरे नही, यह नंगे दरबार के अभिवादन करने का तरीका है चलो तुम दोनो भी अभिवादन करो" चमेली फिर बोली, "कामिनी बरा मस्त खेल खेल रही है" 

मैने उसे फिर टोका, "गुस्ताख! तू फिर बोली अब चल जीजू का लॅंड चूम" "दीदी आप चूमने को कहती हैं, कहिए तो मूह में लेकर झार दूँ" हम सब फिर हंस परे. 

चमेली और मैने दरबार के नियम के अनुसार कामिनी की तरह लंड को चूम कर अभिवादन किया फिर जीजाजी ने कामिनी की चून्चियो को चूमा. 

मैने कहा फाउल ! शरीर के बीच के भाग को चूम कर अभिवादन करना है" 
क्रमशः......... 

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